Tuesday, 9 April 2019

बहार

बादलों पर चलकर सात समंदर पार आई है,
मुद्दतों बाद इस आँगन में  बहार आई है!

बागों में सिर्फ गुलों के मेले नहीं आये,
रंग बिरंगे  पक्षियों  की  कतार  आई  है!
हवा में बस खुशबू के रेले नहीं आये,
पेड़ों  पे जवानी फिर एक बार आई  है!

उन ठिठुरती रातों के दिन अब गए,
धूप  की  नयी  चादर  दो  चार  आई  है!
सिर्फ अरमानो का सूरज ही नहीं आया,
हौसलों की बारिश मूसलाधार आई  है!

-आशुतोष

No comments:

Post a Comment

सालगिरह

सोचता हूँ तेरे सालगिरह पर क्या नायाब लिक्खूँ तुझको कली कहूँ या फ़िर खिलता ग़ुलाब लिक्खूँ इश्क़ की सुनहरी राह और तुझसा हसीन साथी तुझे मल्लि...