Monday, 4 December 2017

नही रहा


मनस्वियों का सतयुग सा जपना नहीं रहा, 
तपस्वियों का त्रेता सा तपना नहीं रहा !

ढूंढ़ रहा हूँ नक़्शे में एक नया शहर, 
शहर में अपने अब कोई अपना नहीं रहा ! 

तरसते रहे नींद को हम बरसों तलक, 
अब इन आँखों में कोई सपना नहीं रहा ! 

दिल के बाजार में कही बिक गयी लैला , 
अब गलियों में मजनूँ का तड़पना नहीं रहा ! 

काली होती गयी शामें और बुझते गए दीये , 
अब बागों में जुगनुओ का पनपना नहीं रहा ! 

पहाड़ों का सीना तो हम भी चीड़ सकते थे , 
पर किसी की याद में दिल का धड़कना नहीं रहा !

-आशुतोष 

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