मातु पितु दरस को हृदय अकुलाहीं !
ऊधो, मोहि ब्रज बिसरत नाहीं !!
ग्वाल गोप जहँ माखन खाहीं !
उन सम कहाँ सखा जग माहीं !!
सुर नर मुनि भजन जहँ गाहीं !
गुरु कृपा की जहँ अविरल छाहीं !
ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं !
सोचता हूँ तेरे सालगिरह पर क्या नायाब लिक्खूँ तुझको कली कहूँ या फ़िर खिलता ग़ुलाब लिक्खूँ इश्क़ की सुनहरी राह और तुझसा हसीन साथी तुझे मल्लि...
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